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Reality of man and father(पुरुष और पिता की वास्तविकता )By Neeraj kumar

पुरुष और पिता की वास्तविकता  पुरुष एक पिता है पुरुष वो इन्सान है जो दुनिया में सबसे ज्यादा संख्या में है पुरुष एक ऐसा इन्सान जिसके बिना दुनिया अधूरी समझी जाती है पुरुष समाज का वो चेहरा होता है जिसको सबसे ज्यादा अहमियत मिलती आई है इस सृष्टि की संरचना में दो ही प्राणियों की उत्पप्ति हुई एक स्त्री और एक पुरुष है पुरुष स्त्री से ज्यादा बलशाली होता है| जो अपने शारीरिक कद काठी और रंग रूप की तरह स्त्री से बिकुल अलग होता है पुरुष स्त्री से ज्यादा बलवान सिद्ध हुआ है| पुरुष ही समाज में एक पिता की भूमिका में अपने फर्ज को निभाता है| पिता घर परिवार का वो सदस्य होता है जिसपर अपने परिवार की जिम्मेदारी होती है जो अपने घर परिवार के लिए हमेशा से संधर्षपूर्ण रहता है पिता की भूमिका में एक पुरुष हर युग में अपनी भूमिका अच्छी तरह निभाता आया है पिता अपने उन रिश्तो को हमेशा से अहमियत देता आया है जो उसको एक पिता की संज्ञा से परिपूर्ण करते है| जैसे एक बेटा या बेटी | पुरुष और पिता का विचार  पुरुष ही एक ऐसा प्राणी है जिसके पास स्त्री के मुकाबले ज्यादा बल देखने को मिलता है| संसार में ना जाने कितने पुरुषो ने जन्
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The Reality of ideal and teacher(आदर्श और अध्यापक की वास्तविकता) By Neeraj Kumar

  आदर्श और अध्यापक की वास्तविकता इन्सान अधिकतर अपने अध्यापक को ही अपना आदर्श बना लेता है| आदर्श होना इन्सान के जीवन के लिए उस सीडी का काम करता है जो इन्सान अपने जीवन में बनने का सपना देखता है| वैसे तो अध्यापक शब्द हमें विधालयो से मिलने वाले ज्ञान को देने वाले इंसानों को अध्यापक कहते है| और सही मायनो में अध्यापक उस इन्सान को भी कह सकते है जो अपने शिष्य को सही रास्तो का ज्ञान देता हो| और वो ज्ञान उस इन्सान को कही भी प्राप्त हो सकता है| आदर्श बनना और आदर्श बनाना, दोनों तरीको से आदर्श शब्द की वास्तविकता को पेश करना होता है| आदर्श इन्सान तभी बनाता है जब किसी इन्सान का प्रभाव उस इन्सान पर पूरी तरह से हो और वो अपने जीवन में उसके जीवन से प्रेरणा लेता हो| तब कोई इन्सान किसी दुसरे इन्सान को अपना आदर्श मान लेता है|   आदर्श और अध्यापक की विचार बहुत से इंसानों ने अपने जीवन में एक ऐसे आदर्श को चुना होगा जो उनके जीवन को सही दिशा और सही दशा करने का काम करता होगा| ज्यादातर इन्सान अपनी उपलब्धियों में उस इन्सान को अपना आदर्श समझ लेते ह

The Reality of Hindu and Hindustan(हिन्दू और हिंदुस्तान की वास्तविकता) By Neeraj kumar

  हिन्दू और हिंदुस्तान की वास्तविकता हिन्दू  धर्म एक ऐसा धर्म जो दुनिया में सबसे पहले हुआ | जिसका इतिहास करीब 10 हजार साल से भी पुराना मिलता है| जिसके प्रमाण अभी भी कही ना कही मिल जाते है| जो सत युग से त्रेता युग से द्वापर युग से कलयुग तक पहुच सका है| हर युग में हिन्दू धर्म के महत्व को समझाया गया है| हिंदुस्तान एक ऐसा देश है जो दुनिया का सातवाँ सबसे बड़ा देश माना जाता है| जिसको समुन्द्र ने तीनो और से घेर रखा है| हिंदुस्तान वो देश है| जहाँ स्वयं देवी देवताओ का वास है| जो स्वयं हिन्दू धर्म के लिए सही साबित होते है| हिमालय से कन्याकुमारी तक ना जाने कितने तीर्थ स्थल है| जो हिन्दुओ की आस्था के प्रतीक माने जाते है हिन्दू और हिंदुस्तान दोनों की वास्तविकता एक दुसरे से पूरी तरह जुडी हुई है| हिंदुस्तान एक ऐसा देश है जिसमे हर राज्य की अपनी एक भाषा होते हुए भी अपने आप में एकता का प्रतीक है| हिंदुस्तान की कोई मात्र भाषा नहीं है| सिर्फ हिंदुस्तान की राज भाषा है |  हिंदी जो सविधान लागू होने के बाद से मानी जाती है| हिंदुस्तान पर प्रचीन काल से ही दुसरे देशो की नजर बनी रही और आज भी पडोसी देशो की न

The Reality of Game and player(खेल और खिलाडी की वास्तविकता) By Neeraj Kumar

खेल और खिलाडी की वास्तविकता खेल वो है जिसको खिलाडी अपने मनोरंजन के लिए खेलता है| खेल को एक ऐसा मनोरंजन कह सकते है जिसमे खिलाडी की उपयोगिता बहुत महत्व रखती है| दुनिया में बहुत सारे खेल है और उन खेलो को खेलने के लिए खिलाडियों की जरुरत होती है किसी भी खेल को बिना खिलाडी के नहीं खेला जाता| सभी खेलो को खेलने के लिए खिलाडी की जरूरत होती है खेल का महत्व जीवन के बचपन से ही इन्सान महसूस करने लगता है| इन्सान अपने जीवन में कई खेल खेलता है लेकिन जब वो किसी खेल का खिलाडी बनने के बारे में सोचता है तो उस इन्सान के प्रति उस खेल को महत्व दिया जाता है| जिसका खिलाडी बनने के बारे में सोचा था| अलग अलग खेल को अलग अलग तरह से ही खेला जाता है| कुछ खेलो को खेलने के लिए कुछ विशेष वस्तुओ की जरुरत पड़ती है| उनके बिना कोई भी खिलाडी उस खेल को नहीं खेल सकता है और कुछ खेल ऐसे भी है जिनको खेलने के लिए कोई वस्तु की जरुरत नहीं पड़ती, वो सिर्फ खिलाडी आपस में ही खेल सकते है| खेल किसी भी उम्र में खेला जाये वो अपने मनोरंजन का पूरा उत्साह खिलाडियों में जगाये रखता है| खेल और खिलाडी का विचार खेल और खिलाडी दोनों का महत्व ए

The Reality of Popularity and democracy(लोकप्रियता और लोकतंत्र की वास्तविकता) By Neeraj kumar

  लोकप्रियता और लोकतंत्र की वास्तविकता लोकतंत्र   में लोकप्रियता आसानी से मिल सकती है| लोकतंत्र दुनिया की वो आजादी है जो किसी भी इन्सान के लिए बहुत महत्व रखती है| लोकतंत्र की बात की जाए तो दुनिया के कई देशो में लोकतंत्र है जिसमे भारत सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश है जिसमे लोकतंत्र बहुत मजबूती के साथ कायम है| लोकतंत्र का आगाज़ सबसे पहले देश अमेरिका के द्वारा किया गया था| तब से कई देश लोकतंत्र की राह को अपना चुके है| वही लोकप्रियता की बात की जाए तो दुनिया में जहाँ लोकतंत्र है वहां किसी भी इन्सान को लोकप्रियता मिल सकती है लोकप्रियता पाने के भी लोकतंत्र में बहुत सारे रास्ते है जो आसानी से इन्सान को लोकप्रियता की बुलंदियों तक पंहुचा देते है| लोकतंत्र सविधानिक प्रक्रियाओ के द्वारा ही तय होता है जिसमे कई प्रकार से इन्सान को वो आजादी दी जाती है जिसका हक़दार स्वयं इन्सान ही होता है| लोकतंत्र नागरिको की उस आवाज को बुलंद करता है जिसमे नागरिक अधिकार ही प्राथमिकता से आते है|     लोकप्रियता और लोकतंत्र का विचार लोकतंत्र के इतिहास को जानना है तो सबसे पहले लोकतान्त्रिक देशो के सविधान को पढना चाहिए| ज

The reality of constitution and operation(सविधान और संचालन की वास्तविकता) By Neeraj kumar

  सविधान और संचालन की वास्तविकता सविधान है तो संचालन भी है| सविधान शब्द और संचालन शब्द एक दुसरे से पूरी तरह जुड़े हुए है दोनों शब्दों को अगर अलग अलग भी कर दिया जाए तो भी सविधान और संचालन शब्द की वास्तविकता एक दुसरे की परिभाषा में अपने आप आने लगती है| सविधान देश का वो प्रमाण होता है| जिसपर इन्सान का जीवन टीका होता है| सविधान शब्द से ही इन्सान अपने लिए और अपने देश के लिए महत्व रखने लगता है सविधान को जन्म से ही उस इन्सान को अपनाना होता है जिसमे उसने जन्म लिया होता है| सविधान यदि कठोर होता है तो इन्सान का जीवन भी कठोर होता है| और यदि सविधान लचीला होता है तो इन्सान का जीवन भी लचीला होता है| अलग अलग देश के अपने अपने सविधान है जिसके आधार पर ही इन्सान का जीवन व्यतीत होता है| कई देशो के कठोर सविधान है तो कई देशो के लचीले सविधान है| और कुछ देशो के सविधान ना तो कठोर होते है और ना ही लचीले होते है| जिसमे से एक भारत देश है जिसका सविधान भी कुछ इसी तरह का है| वही संचालन को चलाने की क्रिया, प्रबंधन या व्यवस्था करने को कह सकते है| वैसे भी संचालन का सही अर्थ को समझना है तो सविधान किस तरह से अपनी सुचार