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Reality (वास्तविकता) By Neeraj Kumar

                             वास्तविकता

वास्तविकता को समझने के लिए हमें ये समझना होगा की हम किस तरह की वास्तविकता की बात कर रहे है| कभी हम सोते, जागते, उठते, बैठते, किसी विषय, वस्तु या दृश्य जगह के बारे में सोचने विचारने लगते है| जब हमारे सामने किसी विषय, वस्तु या दृश्य जगह की बात होती है तो हम उसकी कल्पना अपनी सोच में बना लेते है| कई बार हम दूसरी बनाई गई कल्पनाओ को भी अपनी सोच और विचार में रखते है और बार बार उसी तरीके से सोचने की कोशिश करते है| शायद जो हम सोच रहे है, वैसा ही होगा| लेकिन हमारी वो सोच उस वास्तविकता से बिल्कुल अलग होती है| जब हम वास्तविकता में आते है तो हमारे सामने जितने भी विचार और सोच उत्पन हो रहे थे, उससे वास्तविकता बिल्कुल अलग होती है| 

वास्तविकता का विचार

वास्तविकता उसे कहते है जो हमारी आखो के सामने घटित हुआ हो, या किया गया हो| या किसी द्रश्य या जगह को देखा गया हो| जिस समय वास्तविकता हमारे सामने होती है, हम कोई विचार और सोच को अपने मन के अंदर उत्पन नहीं होने देते| लेकिन कई बार ऐसा भी होता है की हम जिस विषय, वस्तु जगह दृश्य के बारे में सोच रहे थे| वास्तविकता में भी वैसा ही हुआ हो, लेकिन ये बहुत कम देखने को मिलता है| जबकि वास्तविकता सोची गई कल्पनाओ से बिलकुल अलग एक ऐसी हकीकत होती है, जिसको हमें स्वीकारना ही होता है| हमारे जीवन में जितने भी कार्य होते है वो सब वास्तविकता में ही होते है| हम कोई भी कार्य कल्पना में नहीं कर सकते| हम सिर्फ कल्पनाओ में सोच सकते है, जैसे हम किसी कहानी के बारे सोच कर उसको लिख ले और बाद में उस कहानी को वास्तविकता के लिए उस पर कोई फिल्म बना सकते है| 

वास्तविकता का महत्व

हमें अपने जीवन को वास्तविकता से ही व्यतीत करना होता है| कभी हम कोई ऐसी वस्तु देख लेते है, जिसको देख कर किसी दूसरी वस्तु के बारे में सोचने लगते है| जिसके बारे में हमें कुछ नहीं पता होता| इन्सान का सामना जब उस वस्तु की वास्तविकता से होता है तो वो अपनी बनाई गई कल्पना को याद नहीं कर पाते| क्योकि हमारे सामने वास्तविकता ही होती है, जिसको हमें स्वीकारना ही होता है| हर एक विषय, वस्तु, दृश्य जगह की वास्तविकता होती है| हमारे जीवन जीने का आधार ही वास्तविकता में होना चाहिए, और होता भी है| क्योकि कल्पनाओ में सिर्फ सोचा जाता है, घटित हमेशा वास्तविकता में होता है| 

                                                                         Reality 

To understand intellectual reality, we have to understand what kind of reality we are talking about. Sometimes we sleep, wake up, wake up, sit, start thinking about some subject, object or visible place. When there is a matter of a subject, object or visible place in front of us, we make its imagination in our thinking. Many times we keep other imaginations in our thoughts and thoughts and try to think in the same way again and again. Maybe what we are thinking will be the same. But our thinking is completely different from that reality. When we come into reality, reality is completely different from all the thoughts and thinking that were being produced in front of us. Reality is what is said to have happened in front of our eyes, or has been done. Or any scene or place has been seen. At the time when reality is in front of us, we do not allow any thought and thinking to arise inside our mind. But sometimes it happens that we were thinking about the subject, object and scene. The same has happened in reality, but it is rarely seen. Whereas reality is a reality, which is something which we have to accept. All the work that is done in our life is all done in reality. We cannot do any work in imagination. We can only think in fiction, like we can write a story after thinking about it and later we can make a film on that story for reality. We have to spend our life from reality. Sometimes we see such an object, by looking at it, we start thinking about something else. About which we do not know anything. When a person is confronted with the reality of that object, he is unable to remember his imagination. Because we have only reality, which we have to accept. Every subject, object, scene is reality. The basis of living our life should be in reality, and it is. Because in imaginations, only thought occurs, it always happens in reality.

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