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Reality of truth and lies(सच और झूठ की वास्तविकता) By Neeraj Kumar

 

सच और झूठ की वास्तविकता

वास्तविकता

सच और झूठ ये वो दो रास्ते है जिनका चयन स्वयं उस इन्सान को करना होता है जिसके सामने ये रास्ते हो| वो चाहे तो सच का साथ दे सकता है और यदि वो चाहे तो झूठ का साथ दे सकता है| सच जितना कडवा लगता है झूठ उतना ही मीठा लगता है सच का रास्ता उलझनों से भरा मिलता है झूठ का रास्ता समतल तो होता है लेकिन उसकी कोई मंजिल नही होती| 

सच और झूठ पर विचार  

कहते है सच कड़वा जरुर होता है लेकिन उसकी मिठास महसूस होती रहती है| और झूठ जितना मीठा लगता है उसकी कडवाहट उतनी तेजी से अपना असर दिखाने लगती है जब कभी सच और झूठ का सामना होता है तो हमेशा सच को ही जीत हासिल होती है क्योकि झूठ की मिठास सच के आगे अपना वजूद खो बैठती है| 

सच और झूठ का महत्व   

1.      सच की नीव इतनी मजबूत होती है की जो कभी बने हुए घरोंधे को नुकसान नहीं पहुचाती| कभी कभी हमें सच बोलने पर दुसरो की नफरतो का सामना भी करना पड़ जाता है सच की रौशनी इंतनी तेज होती है की वो अंधकार का नाश कर देती है  सच को कितना भी दबाने की कोशिश की जाये सच को कभी नहीं दबाया जा सकता| हर इन्सान के जीवन में सच उतना ही महत्त्व रखता है जितना उनका जीवन| सच रिश्तो में मजबूती बना के रखता है सच इन्सान के व्यक्तित्व के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है सच का रास्ता कठिन और लम्बा  जरुर हो सकता है लेकिन सच की मंजिल कभी खराब नहीं होती|

 

2.      वही झूठ की नीव इतनी  खराब और कमजोर होती है जो कभी भी बनी हुई ईमारत को बर्बाद कर सकती है कभी कभी झूठ की मिठास में हमें वो मिल जाता है जिसकी कामना हम करते हो| लेकिन झूठ की कडवाहट सारी उम्र महसूस होती रहती है झूठ को ज्यादा दिन तक अँधेरे में नहीं रखा जा सकता उसको एक ना एक दिन सच की रौशनी में आना ही पड़ता है| झूठ इन्सान की वो बुराई होती है जिसका साथ कोई नहीं देता| झूठ का चेहरा सामने आने के बाद उसको नफरत ही नफरत मिलती है और वो इन्सान दुबारा उस ईमारत को कभी खड़ा नहीं कर सकता जो सच की नीव को धोखा दे कर रखी गई थी|

3.      सच और झूठ के इस्तेमाल से ही इन्सान के व्यक्तित्व की असली पहचान बनती है इन्सान को ये समझना होगा की सच का रास्ता पकड़ना है या झूठ का रास्ता सच और झूठ की मुसीबते कितने दिन तक टिकी रहती है जो हर तरह के रिश्तो के लिए जरुरी होती है दुनिया में हर जगह सच को ही मुसीबते सहनी पड़ती है| लेकिन सच  का सामना कोई नहीं कर पाता है जबकि झूठ तो मुसीबतों का पुलिंदा ओढे रहता है| और कभी भी अपने पुलिंदे में फंस कर रह जाता है|

अंत सच और झूठ दोनों ही पूर्व और पश्चिम की तरह होते है कभी भी दोनों एक साथ नहीं चल सकते इसी तरह इन्सान को अपने जीवन में दोनों रास्तो में से एक को चुन कर चलना चाहिए और उससी से उसके व्यक्तित्व की पहचान बनी रहती है और वो पहचान उसकी मृत्यु के बाद भी दुनिया को याद रहती है| की वो इन्सान कितना सच्चा और कितना झूठा था|



Reality of truth and lies

The reality

Truth and falsehood are the two paths that the person himself has to choose in front of those paths. If he wants, he can support the truth and if he wants, he can support the lie. The more bitter the truth, the sweeter the lie.

Thoughts on truth and lies

It is said that the truth is bitter but its sweetness is felt. And the sweeter the lie seems, the faster its bitterness starts to show its effect. Whenever truth and lies are confronted, the truth always wins because the sweetness of the lie loses its existence in front of the truth.

Importance of truth and lies

1. The foundation of truth is so strong that it does not harm the houses built. Sometimes we have to face the hatreds of others when we tell the truth, the light of truth is intensified that it destroys the darkness, no matter how much is tried to suppress the truth, the truth can never be suppressed. Truth is as important in the life of every person as his life. Truth maintains strength in relationships, truth plays an important role for a person's personality, the path of truth can be difficult and long, but the destination of truth is never spoiled.


2. The foundation of the same lie is so bad and weak that it can ruin the building ever built, sometimes in the sweetness of lies we get what we wish for. But the bitterness of lies is felt throughout the life, the lie cannot be kept in darkness for a long time, it has to come in the light of truth one day or the other. Lies are the evil of human beings, which no one supports. After the face of the lie is revealed, he hates hatred and that person can never stand the building that was laid down by betraying the foundation of truth.

3. It is only by the use of truth and lies that the real identity of the person of the person is formed, the person has to understand whether the path of truth is to be taken or the path of lies is true and how long the problems of falsehood remain for every kind of relationship. It is important that truth has to suffer everywhere in the world. But no one is able to face the truth, whereas the lie is a bundle of troubles. And sometimes it gets stuck in its truss.

The end is both true and false. Like East and West, both can never walk together. In this way, a person should choose one of the two paths in his life and from that his identity of his personality remains and Recognition the world remembers even after his death. How true and how false that person was.

     

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