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Showing posts from December, 2020

Reality of Question and dialogue (सवाल और संवाद की वास्तविकता)By Neeraj kumar

  सवाल और संवाद की वास्तविकता वास्तविकता  कहते है संवाद ही सवालों के जवाब जानने का सही तरीका होता है सवाल ही संवाद को उजागर करते है यदि सवाल नहीं होते तो संवाद भी नहीं होते संवाद से सवाल का महत्व होता है| और सवाल ही संवाद के लिए रास्ता बनाता है संवाद के बिना हर वो सवाल अधुरा होता है जिसमे संवाद न हुआ हो| और हर वो संवाद अधुरा होता है जिसमे कोई सवाल छुपा ना हो इसलिए हर सवाल का सही परिचय संवाद से ही होना चाहिए| जो सवाल के महत्व को बढ़ा देता है सवाल और संवाद का विचार सवाल और संवाद उसको कह सकते है जिसमे दो या दो से अधिक इंसानों के द्वारा उस सवाल का सही परिचय दिया गया हो या उस सवाल के उत्तर की महत्वकांक्षा का पता चलता हो| जो संवाद से होकर दुनिया के सामने आता है| उसको हम संवाद और सवाल का विचार कह सकते है| हर उस विषय, वस्तु के बारे में जानने की जिज्ञासा ही हमारा सवाल बन जाता है और उस सवाल को कितने प्रकार के विचारो से होकर जाना पढता है वो संवाद बन जाता है|   सवाल और संवाद का महत्व इस दुनिया में लाखो सवाल हुए जिनको किसी ना किसी संवाद के जरिये उसका उत्तर मिला और आज भी दुनिया के सामने ल

Reality of expectation and decision(उम्मीद और निर्णय की वास्तविकता) By Neeraj kumar

  उम्मीद और निर्णय की वास्तविकता वास्तविकता कहते है उम्मीद पर दुनिया कायम है जिसके पीछे वो निर्णय होते है जो जीवन में लिए होते है हमने अपने जीवन में बहुत से ऐसे निर्णय लिए होंगे जिसकी हमें उम्मीद होती है की ये जरुर पुरे होंगे| हमारे निर्णय ही हमारी उस उम्मीद को कायम रखते है जो निर्णय हमने लिया था हमारे निर्णयों को हमारी उम्मीद ही बनाए रखती है की हम जीवन में अपने कार्यो को पूरा कर लेंगे| या नहीं| उम्मीद और निर्णय का विचार इन्सान को अपने हर उस कार्य क्षेत्र या हर उस निर्णयों से उम्मीद होती है जो जीवन के संघर्षो में उसने उम्मीद के साथ लिए होते है कभी कभी हम अपने निर्णयों की वजय से किसी के साथ उम्मीद लगा लेते है की ये मेरे निर्णय की कद्र करेगा लेकिन कभी वो निर्णय सही साबित होते है तो कभी गलत साबित होते है और तब हमारी उम्मीद टूट जाती है इसके पीछे हमरा वो निर्णय था जिसकी वजह हमारी उम्मीद बनी| उम्मीद और निर्णय का महत्व   हम किसी ना किसी से कोई ना कोई उम्मीद जरुर रखते होंगे| चाहे इसमें रिश्तो की बात कर ले या किसी दोस्त की बात हो जाये या फिर अपने जीवन साथी ही क्यों ना हो| हम अपनी उम

Reality of sin and virtue(पाप और पुण्य की वास्तविकता)By Neeraj kumar

  पाप और पुण्य की वास्तविकता    किसने कितने पाप किये और किसने कितने पुण्य इसका प्रमाण किसी के पास नहीं है। ये कोई नहीं बता सकता की किस इन्सान ने पाप ज्यादा किये है या पुण्य ज्यादा किये है। पाप जितने जीवन में प्रभाव डालते है उतने ही किये गए पुण्य भी प्रभाव डालते है जितना आसान पाप करना लगता है उतना ही मुश्किल पुण्य करना लगता है| इन्सान का जीवन उसके पाप और पुण्य के आधार पर ही चलता रहता है| कर्मो को अच्छा और बुरा मानने वाले दुसरे उसको पाप और पुण्य की संज्ञा देते है जँहा इन्सान को किये गए पाप को भुगतना पढता है तो वही किये गए पुण्य का भी फल मिलता है। लेकिन कब किसको किसी के किये गए पाप की सजा मिले| और वही कब किसको किये गए पुण्य का फल मिले उसका कोई सही समय निर्धारित नहीं होता| कब किसको किस पाप की सजा मिल जाये और कब किसको पुण्य का फल मिले ये भी कोई नहीं बता सकता| पाप और पुण्य का विचार कहते है जीवन में जिन सुखो की प्राप्ति इन्सान को मिली वो किये गए पुण्य कर्म के आधार पर है| और जिन दुखो को भुगतना मिला वो किये गए पाप कर्म के आधार पर है| इन्सान के विचार में जो कर्म उसके द्वारा किये जाते ह

Reality of praise and condemnation(प्रशंसा और निंदा की वास्तविकता)By Neeraj kumar

  प्रशंसा और निंदा की वास्तविकता वास्तविकता कहते है जीवन में प्रशंसा और निंदा दो ऐसे शब्द है जो इंसान के  मनोबल को गिराने और मनोबल को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है| जब इन्सान की प्रशंसा होती है तो इन्सान का मनोबल बढ़ता है और जब इंसान की निंदा होती है तो मनोबल गिरता है प्रशंसा में इन्सान वो अपने सार्थक कर्म के लिए और आगे बढ़ता चला जाता है और जब इन्सान की निंदा होती है तो वो अपने उस सार्थक कर्म को करने में संकोच करता है जरुरी नहीं की इन्सान के हर कार्य में उसको प्रशंसा ही मिले और यह भी जरुरी नहीं की इन्सान के हर कार्य में उनको निंदा ही मिले| प्रशंसा जितनी अच्छी लगती है उतनी ही बुरी निंदा लगती है|प्रशंसा और निंदा दोनों शब्दो के अर्थ अलग अलग बताये गए है। जो इंसान के कार्यों से लेकर इंसान के जीवन पर एक गहरा प्रभाव छोड़ते है। जिसका असर इंसान के मन मस्तिक्ष पर भी पड़ता है। प्रशंसा और निंदा का  विचार प्रशंसा का प्रभाव जितना जीवन में पढता है उतना ही निंदा का भी पढ़ता है प्रशंसा में इन्सान खुशी महसूस करता है तो निंदा में दुख और पछतावे को महसूस करता है| लेकिन जहा प्रशंसा से कुछ प्रा

Reality of ego and importance (अहंकार और अहमियत की वास्तविकता)By Neeraj kumar

  अहंकार और अहमियत की वास्तविकता  अहंकार एक ऐसा स्वभाव जो धीरे धीरे किसी भी इंसान के लिए उसको नीचे गिराने का काम करता है इंसान की सोच में जब मैं, मेरा, और मुझे के शब्द आने लगे तो उसमे अहंकार की भावना को देखा जा सकता है जिससे इन्सान अपनी अहमियत खो देता है इन्सान जब अपने व्यक्तित्व में दुसरो के द्वारा दी जाने वाली अहमियत को ज्यादा महसूस करने लगे| और अपने लिए मैं ,मेरा और मुझे के शब्दों को उत्पन्न करे तो उसमे अहंकार की भावना आने लग जाती है अहंकार जितना इन्सान के व्यक्तित्व से दूर होता है उसका जुडाव उतना ही दुसरे इंसानों से होता है अहंकार ही अहमियत के रास्ते में आने वाला वो पड़ाव है जिसमे इन्सान फंस जाता है जो इन्सान अहंकार के पड़ाव को दरकिनार कर लेता है उसकी अहमियत हमेशा बनी रहती है| अहंकार और अहमियत का  विचार इन्सान कितने ही बड़े पद प्रतिस्था पर विराजमान क्यों ना हो यदि उसमे अहंकार के गुण आने लगते है तो उन गुणों की वजय से उसके पद की गरिमा को खो देता है कहते है अहंकार का दायरा ज्यादा बड़ा नहीं होता| वो दायरा तबतक ही रहता है जब तक दुनिया को उसकी अहमियत लगती हो| इन्सान अपने अहंकार में

Reality of character and face(चरित्र और चेहरे की वास्तविकता)By Neeraj kumar

  चरित्र और चेहरे की वास्तविकता जीवन मे चरित्र और चेहरे का बहुत महत्व है जितना चेहरे को महत्व दिया जाता है उतना ही चरित्र को भी महत्व दिया जाता है यदि चरित्र अच्छा ना हो| चेहरे की कोई अहमियत नहीं होती| चरित्र और चेहरे में इन्सान के व्यक्तित्व की सच्चाई छुपी होती है चरित्र और चेहरे में कौन किसको कितना पसंद आता है| ये समझना मुश्किल होता है| कभी किसी को किसी का चेहरा अच्छा लगता है तो उसका चरित्र अच्छा नहीं लगता| और किसी को किसी का चरित्र अच्छा लगता है तो चेहरा अच्छा नहीं लगता| चरित्र और चेहरे में किसको कितना महत्व मिलता है ये हमको समझना चाहिए| चरित्र और चेहरे का विचार इन्सान के व्यक्तित्व में चरित्र और चेहरे की एक महत्वपूर्ण भूमिका समझी जाती है किसी इन्सान का चेहरा देखने में इतना अच्छा लगता है की कोई दूसरा इन्सान उसके बारे में अपनी कल्पना बना लेते है| जब उसके चरित्र का पता चलता है तो वो बनाई गई कल्पना गलत साबित होती है| इसी तरह जब कोई इन्सान किसी दुसरे इन्सान के चरित्र की बात करता है तो दुसरे इन्सान उसके चेहरे की कल्पना बना लेते है और यदि वो इन्सान दुसरे के द्वारा बनाई गई कल्पना स

Reality of strength and endurance(शक्ति और सहनशक्ति की वास्तविकता) By Neeraj kumar

  शक्ति और सहनशक्ति की वास्तविकता वास्तविकता शक्ति और सहनशक्ति दोनों ही इन्सान की  अंदरूनी  ताकत की निशानी होती है जहा शक्ति का प्रदर्शन होता है वहा सहनशक्ति की कोई जरुरत नहीं होती| और जहा सहनशक्ति का प्रदर्शन होता है वहा शक्ति की कोई जरुरत नहीं होती| दोनों ही इन्सान की रूप रेखा होती है कई इन्सान शक्ति दिखाकर ज्यादा प्रदर्शन करना पसंद करते है तो कई सहनशक्ति दिखाकर अपने व्यक्तित्व का प्रदर्शन करते है| जितना कठिन शक्ति का प्रदर्शन करना होता है उतना ही सरल सहनशक्ति का प्रदर्शन करना| शक्ति को दुसरो का सामना करना पढ़ जाता है तो सहनशक्ति को किसी का सामना नहीं करना पढता| कभी कभी शक्ति दिखाने वाले को ताकतवर समझा जाता है तो सहनशक्ति दिखने वाले को डरपोक समझा जाता है| जबकि ऐसा नहीं होता की जो सहनशक्ति दिखा रहा है वो अपनी शक्ति नहीं दिखा सकता या जो शक्ति दिखा रहा है वो अपनी सहनशक्ति नहीं दिखा सकता| दोनों को ही इन्सान का एक रूप समझा जाता है| शक्ति और सहनशक्ति का विचार   शक्ति और सहनशक्ति इन्सान के अंदर का एक रूप है जो कभी कभी देखने को मिलती रहती है कभी कभी इन्सान को शक्ति दिखानी पढ़ती है तो क