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Reality of praise and condemnation(प्रशंसा और निंदा की वास्तविकता)By Neeraj kumar

 

प्रशंसा और निंदा की वास्तविकता

वास्तविकता

कहते है जीवन में प्रशंसा और निंदा दो ऐसे शब्द है जो इंसान के  मनोबल को गिराने और मनोबल को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है| जब इन्सान की प्रशंसा होती है तो इन्सान का मनोबल बढ़ता है और जब इंसान की निंदा होती है तो मनोबल गिरता है प्रशंसा में इन्सान वो अपने सार्थक कर्म के लिए और आगे बढ़ता चला जाता है और जब इन्सान की निंदा होती है तो वो अपने उस सार्थक कर्म को करने में संकोच करता है जरुरी नहीं की इन्सान के हर कार्य में उसको प्रशंसा ही मिले और यह भी जरुरी नहीं की इन्सान के हर कार्य में उनको निंदा ही मिले| प्रशंसा जितनी अच्छी लगती है उतनी ही बुरी निंदा लगती है|प्रशंसा और निंदा दोनों शब्दो के अर्थ अलग अलग बताये गए है। जो इंसान के कार्यों से लेकर इंसान के जीवन पर एक गहरा प्रभाव छोड़ते है। जिसका असर इंसान के मन मस्तिक्ष पर भी पड़ता है।

प्रशंसा और निंदा का विचार

प्रशंसा का प्रभाव जितना जीवन में पढता है उतना ही निंदा का भी पढ़ता है प्रशंसा में इन्सान खुशी महसूस करता है तो निंदा में दुख और पछतावे को महसूस करता है| लेकिन जहा प्रशंसा से कुछ प्राप्त होता दिखता है तो निंदा से कुछ खोता हुआ| प्रशंसा उन सभी रास्तो को खोलती है जिसमे कमियाबी की राह दिखती हो और निंदा उन सभी रास्तो को बंद करती है जिसमे कमियाबी की राह खत्म होती हो| इन्सान के कार्य में जो मनोबल लगता है उसका गिरना और बढ़ना प्रशंसा और निंदा से महसूस होता है

 प्रशंसा और निंदा का  महत्व  

प्रशंसा ऐसी होनी चाहिए जिससे दुनियां को जीवन में आगे बढ़ने की दिशा दिखती हो|और निंदा ऐसी होनी चाहिए जिससे दुनियां को सिख मिलती हो|किसी को कोई नुकसान न हो| जब हम किसी से अपने किये गए कार्यो की प्रशंसा मिलती है तो अपने आपको गर्व महसूस होता है और जब हम किसी से अपने कार्यो की निंदा सुनते है तो पछतावा होता है|

प्रशंसा और निंदा का परिचय कोई दूसरा ही दे सकता है की उसने ये काम कैसा किया| क्योकि हम अपने कार्यो की स्वय प्रशंसा भी नहीं कर सकते और निंदा भी नहीं कर सकते| दोनों में कार्य के लिए मनोबल का महत्व छुपा होता है| हम किसी की प्रशंसा करके उससे अपना मतलब भी निकाल सकते है और हम किसी की निंदा करके उससे अपनी इर्षा भी निकाल सकते है|

इन्सान को प्रशंसा में अपनी दिशा से डगमगाना नहीं चाहिए| तो उसी तरह इन्सान को निंदा में भी अपना हौसला नहीं खोना चाहिए| निंदा जितनी कठोर और कडवी लगती है तो प्रशसा उतनी ही सरल और मीठी| प्रशंसा मंजिल की तरफ और आगे बढ़ाने का काम करती है तो निंदा मंजिल से धकेलने का|

निष्कर्ष

इन्सान के किये गए सभी कार्य प्रशंसा और निंदा के लिए नहीं होने चाहिए| प्रशंसा जितनी महत्व रखती है उतनी ही निंदा भी प्रशंसा दिल को खुश करती है तो निंदा दुखी करती है| कार्यो में दोनों का सामान महत्व होता है|


Reality of praise and condemnation

The reality

It is said that praise and condemnation are two such words in life which play an important role in lowering the morale of the human being and boosting the morale. When a person is praised then the morale of the person increases and when the person is condemned, the morale falls. In praise, the person goes on and on for his meaningful deeds and when the person is condemned, then he gets that meaningful He does not hesitate to do karma, it is not necessary that he should be praised in every work of human being and it is not necessary that he should get condemnation in every work of human being. As good as praise is, evil is condemned. Both the words praise and condemnation have different meanings. Which leave a deep impact on human life from human actions. The effect of which also affects the mind of man.

Thougth of praise and condemnation

The effect of praise reads as much in life as it also reads condemnation; if a person feels happy in praise, he feels sorrow and regret in condemnation. But where something appears to be received by praise, then something is lost by condemnation. Praise opens all the paths in which the path of weakness is visible and condemnation closes all the paths in which the path of weakness ends. Appreciation and condemnation of the morale that is felt in a person's work is felt

Importance of praise and condemnation 

Appreciation should be such that the world looks towards moving forward in life. And the condemnation should be such that the world gets Sikhs. There should be no harm to anyone. When we get praised by someone for what we have done, we feel proud and when we hear someone condemning our actions, we feel regret.

One can only give an introduction to praise and condemnation of how he did this work. Because we cannot praise and condemn our works ourselves. Both of them hide the importance of morale for work. We can also derive our meaning from someone by praising him and we can also remove our envy from someone by condemning him.

Human beings should not waver in their direction in praise. Similarly, human beings should not lose their courage in condemnation. The harder and harder the condemnation sounds, the more simple and sweet the praise is. Praise serves to push the floor towards the floor, so condemnation is pushed from the floor.

The conclusion

All the work done by human beings should not be for praise and condemnation. As much as praise is important, as much condemnation makes the heart happy, condemnation is unhappy, both are equally important in works.

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