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Reality of sin and virtue(पाप और पुण्य की वास्तविकता)By Neeraj kumar

 

पाप और पुण्य की वास्तविकता

  

किसने कितने पाप किये और किसने कितने पुण्य इसका प्रमाण किसी के पास नहीं है। ये कोई नहीं बता सकता की किस इन्सान ने पाप ज्यादा किये है या पुण्य ज्यादा किये है। पाप जितने जीवन में प्रभाव डालते है उतने ही किये गए पुण्य भी प्रभाव डालते है जितना आसान पाप करना लगता है उतना ही मुश्किल पुण्य करना लगता है| इन्सान का जीवन उसके पाप और पुण्य के आधार पर ही चलता रहता है| कर्मो को अच्छा और बुरा मानने वाले दुसरे उसको पाप और पुण्य की संज्ञा देते है जँहा इन्सान को किये गए पाप को भुगतना पढता है तो वही किये गए पुण्य का भी फल मिलता है। लेकिन कब किसको किसी के किये गए पाप की सजा मिले| और वही कब किसको किये गए पुण्य का फल मिले उसका कोई सही समय निर्धारित नहीं होता| कब किसको किस पाप की सजा मिल जाये और कब किसको पुण्य का फल मिले ये भी कोई नहीं बता सकता|

पाप और पुण्य का विचार

कहते है जीवन में जिन सुखो की प्राप्ति इन्सान को मिली वो किये गए पुण्य कर्म के आधार पर है| और जिन दुखो को भुगतना मिला वो किये गए पाप कर्म के आधार पर है| इन्सान के विचार में जो कर्म उसके द्वारा किये जाते है जो उसको एक खुशी प्रदान करते है| और वो कार्य जिसमे वो करने के बाद अपने आप को दुखी महसूस करे| उन कर्मो को पाप और पुण्य की संज्ञा दी जाती है| जरुरी नहीं की कोई इन्सान पाप और पुण्य कर्म करने के बाद ये सोचता  हो की उसने पाप किया या पुण्य ज्यादातर इन्सान ये मानते है की जब हम असहाय इंसानों की मदद करे और हमारी मदद से उसका काम आसान हो गया हो तो हम उसको पुण्य कर्मो में गिनते है और ज्यादातर इन्सान ये मानते है की जब किसी को जान कर चोट पहुचाना और जिसमे उस इन्सान को हमारी वजह से दुःख मिला हो| तो उसको पाप कर्मो में गिना जाता है| जबकि पाप और पुण्य का सही आधार क्या होना चाहिए ये कर्मो के विचार ही बता सकते है|

पाप और पुण्य का महत्व  

जीवन में बहुत सारे ऐसे कर्म है जिसको करने पर हम पाप महसूस करते हो| और उसी तरह बहुत सारे ऐसे कर्म है जिसको करने पर पुण्य महसूस होता हो| लेकिन पाप और पुण्य का असर किसके जीवन में कितना है ये समझना इन्सान के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है इन्सान अपने सभी कर्मो में पाप और पुण्य को सामने रखकर कर सकता है यदि वो ये समझता है की किस कर्म में कितना पाप और किस कर्म में कितना पुण्य है उनका जीवन में कितना असर दिखेगा| तो पाप और पुण्य किये गए सही साबित हो सकते है

इन्सान के जन्म के समय ही पता चलने लगता है की जीवन पर किये गए पाप कर्मो का ज्यादा असर है या किये गए पुण्य कर्मो का क्योकि पाप और पुण्य का ही असर जीवन को सवारने और बिगाड़ने में सबसे ज्यादा फलदाई साबित हुआ है वर्षो से इन्सान पाप और पुण्य को समझते हुए अपना जीवन का निर्वाह करता आया है|और इसी तरह आगे भी करता रहेगा। जिससे उसे पाप और पुण्य कर्मों की प्राप्ति होती रहे।

पाप और पुण्य का असर इंसानी जीवन में सबसे ज्यादा देखने को मिला है ये बात का प्रमाण इन्सान अपने धर्म ग्रंथो को पढ़कर समझकर सिख सकता है की वो किस पाप में लिप्त है या किस पुण्य का भोगी है इन्सान पाप करके यदि उसका प्राश्चित करे तो वो अपने पुण्य कर्म करके कर सकता है और यदि इन्सान पुण्य करता है और उसका गुणगान करता है तो वो पाप के समान होता है जबकि किया गया पुण्य निस्वार्थ होता है और किया गया पाप स्वार्थ से भरा होता है|

निष्कर्ष  

इन्सान अपने कर्मो से ज्यादा से ज्यादा उन इंसानों की मदद करे तो उसको पुण्य कर्मो की प्राप्ति हो सकती है उसको पाप कर्मो से दूर रहना चाहिए ताकि उससे किसी को कोई दुःख ना पहुचे| इन्सान को अपने कर्मो में कभी ये सोच नहीं रखनी चाहिए की उसको पाप और पुण्य करके अपने स्वार्थ को पूरा करना है इन्सान को अपने सार्थक कर्म को निस्वार्थ करते रहना चाहिये| 


Reality of sin and virtue

The reality

No one has proof of who committed so many sins and who performed so many virtues. No one can tell which man has committed more sins or done more virtue. As much as sin affects in life, so much virtue done also affects, the easier it is to commit sin, the more difficult it becomes to perform virtue. A person's life goes on the basis of his sin and virtue. Others consider deeds to be good and bad, and others call them sin and virtue, when a person has to pay for the sin committed, then the virtue done by him will also be rewarded. But when does anyone get the punishment for the sins committed by someone. And no one can determine the exact time of who gets the fruits of the virtue done. No one can tell when, who gets the punishment of any sin and when who gets the fruits of virtue.

Thoughts of sin and virtue

It is said that the happiness that man has got in life is based on the virtuous work done by him. And the sufferings that have been suffered are on the basis of sin committed. In the thought of man, the actions which are done by him, which give him a pleasure. And the work in which you feel sad after doing it. Those deeds are labeled as sin and virtue. It is not necessary that after committing any human sin and virtuous deeds, it is thought that he has sinned or that most human beings believe that when we help the helpless humans and with our help, his work has become easy, then we will be able to do it We count and most people believe that when someone is hurt by knowing and in which that person got hurt because of us. So it is counted in sin deeds. Whereas, what should be the true basis of sin and virtue, it can only tell the thoughts of karma.

Importance of sin and virtue

There are many such actions in life that we feel sinful by doing. And in the same way there are many such acts which feel virtuous by doing them. But it is very important for a person to understand the effect of sin and virtue in whose life it is, if a person can do it by putting sin and virtue in front of all his actions.   

How much sin in which karma and how much virtue is there in which karma, how much effect they will have in life. So sins and virtues can be proved right At the time of the birth of a person it becomes known that the sins committed on life have more effect or the virtuous deeds done because the effect of sin and virtue has proved to be the most fruitful in riding and spoiling life. And considering the virtue, he has been living his life.And will continue to do likewise. Due to which he gets sins and pious deeds.


The effect of sin and virtue has been seen most in human life, the proof of this is that by reading his religious texts, a person can learn and understand what sin he is indulging in or what virtue he has suffered, if he can get atonement by committing human sin. One can do his virtuous deeds and if a man performs virtue and praises it is like a sin whereas the virtue done is selfless and the sin committed is selfish.


The conclusion


If human beings help those human beings as much as they can by their actions, then they can get virtuous deeds, they should stay away from sin deeds so that they do not hurt anyone. A person should never think in his actions that he has to fulfill his selfishness by sinning and doing virtue. Man should continue selfless of his meaningful work.

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