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Reality of karma and duty(कर्म और कर्तव्य की वास्तविकता ) By Neeraj kumar

 

कर्म और कर्तव्य की वास्तविकता  

कर्म और कर्तव्य दोनों शब्दों की वास्तविकता एक दुसरे से बिल्कुल अलग है| कर्म इन्सान के द्वारा किया गया ऐसा कार्य है, जो उसके सुख दुःख का कारण बन जाता है| जबकि कर्तव्य इन्सान का वो कार्य है, जिसको करने के लिए इन्सान उस कार्य को प्राथमिकता देता है और वो उसका कर्तव्य कहलाता है|

कर्म और कर्तव्य दोनों शब्द एक जैसे जरुर लगते है, लेकिन इन शब्दों की वास्तविकता में काफी अन्तर मिलता है| कर्म इन्सान के पाप और पुण्य की एक ऐसी श्रेणी को दिखाते है| जिसको इन्सान को अपने सुख और दुःख के जरिये ही भोगना पड़ता है| कभी कभी कर्म इन्सान के जीवन में सभी तरह के सुख दुःख का कारण भी बनते है| तो कर्मो को करना इन्सान की उस वास्तविकता का प्रदर्शन करते है जिसमे पाप और पुण्य की मात्रा में इन्सान को उसका फल मिलता है|

कर्मो की उत्पति में इन्सान की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहती है जो इन्सान को कर्म करने पर मजबूर करती है कर्म कितना सही और कितना गलत है, वो ईश्वर के हाथो में होता है| लेकिन जिस ईश्वर ने इन्सान को सोचने समझने की शक्ति प्रदान की है वो यदि गलत कर्म करता है तो वो निसंदेह उसके फल का हकदार बनता है| वही इन्सान का कर्तव्य एक ऐसी प्राथमिकता की श्रेणी में आता है जिसके लिए इन्सान सही और गलत में चुनाव भी नहीं कर पाता है| कर्म से ज्यादा अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देने की कोशिश करता है|

कर्म और कर्तव्य का विचार

कर्म और कर्तव्य का विचार एक ऐसी पहचान को उत्पन्न करता है| जिसमे इन्सान के सामने कर्म करते समय सही-गलत, अच्छे-बुरे की पहचान करने के लिए पूरी समझ होती है| जबकि कर्तव्य में इन्सान ना सही और ना गलत, ना अच्छे और ना बुरे की पहचान करने के मायने को भी नहीं समझता| कर्तव्य एक समय सीमा के अनुसार ही किया जा सकता है, जबकि कर्म करने के लिए कोई समय सीमा नहीं होती| इन्सान अपने कर्तव्य में कर्म को ज्यादा महत्व देता है| तो उसके कर्तव्य पर सही और गलत का सवाल उत्पन्न हो जाता है| इन्सान अपने कर्मो से अपने कर्तव्य को भी नहीं तोल सकता| और ना ही अपने कर्तव्य से अपने कर्मो को तोल सकता है| दोनों शब्दों के विषय और भूमिका अलग अलग भाषा, अलग अलग परिवर्तन का चुनाव करती है|

कर्म और कर्तव्य का महत्व

कर्म एक ऐसा कार्य है जिसको करने में इन्सान उसके फल का हक़दार स्वयं बनता है| कर्मो को समझने के लिए इन्सान उन इन्सान से सीख सकता है| जिनको अपने द्वारा किये गए अच्छे और बुरे कर्मो का फल भोगने को मिलता है| कर्म इन्सान के उस साये की तरह होते है जो कभी भी उस इन्सान के सामने आकर खड़े हो सकते है| इन्सान कभी भी अपने कर्मो से पीछा नहीं छुड़ा सकता| कर्म पिछले जन्म के ही क्यों ना हो, उनको इन्सान के सामने एक ना एक दिन आना ही होता है| चाहे कर्म, अच्छे के लिए आये हो या चाहे कर्म, बुरे के लिए आये हो|  

 

कर्तव्य एक ऐसा कार्य है जो इन्सान को अपनी जीविका उत्पन्न करने में मदद करते है| कर्तव्य इन्सान के लिए परिवार, समाज, और देश के लिए अलग अलग हो सकते है| कर्तव्य का चुनाव करना स्वयं इन्सान के हाथो में होता है| कर्तव्य की पूरी रूप रेखा स्वयं इन्सान के द्वारा ही बनाई गई होती है| कर्तव्य कितना ही कठिन क्यों ना हो, उसको करना ही होता है| कर्तव्य में अगर इन्सान मृत्यु के सामने भी खड़ा हो, तो भी वो अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटता| कर्तव्य एक ऐसी पहचान को उजागर करता है, जिसमे इन्सान का व्यक्तित्व अलग और व्यवहार अलग दिखाई देता है|

 

कर्म और कर्तव्य की वास्तविकता का महत्व इन्सान के जीवन पर हमेशा बना रहता है| कर्म इन्सान के जन्म से लेकर मृत्यु तक साथ-साथ चलते है| जबकि कर्तव्य इन्सान की उम्र की  समय-सीमा अनुसार ही साथ साथ चलते है| कर्मो का फल ईश्वर के द्वारा ही दिया जा सकता है| जबकि कर्तव्य का फल इंसानों के द्वारा ही दिया जा सकता है| कई इंसान अपने जीवन में कर्म को प्राथमिकता देते है तो कई इन्सान अपने जीवन में कर्तव्य को प्राथमिकता देते है|  

निष्कर्ष

कर्म और कर्तव्य का अलग-अलग मूल्य इन्सान के लिए ऐसा होना चाहिए, जिसके लिए उसके जीवन पर कभी सवाल ना खड़े किये जा सके|



Reality of karma and duty

The reality of both the words karma and duty is completely different from each other. Karma is a work done by a person, which becomes the reason for his happiness and sorrow. While duty is the work of human being, for which the person gives priority to that work and it is called his duty.

The words Karma and Duty seem to be the same, but there is a great difference in the reality of these words. Karma represents such a category of human sin and virtue. One who has to suffer through his happiness and sorrow. Sometimes all kinds of happiness in the life of karma also cause sorrow. So, performing karma is a demonstration of the reality of human being, in which human being gets the fruits of sin and virtue.

The role of human beings is very important in the production of karma, which forces the person to do karma, how right and how wrong karma is in the hands of God. But if the God who has given a person the power to think and thinks wrongly, then he surely deserves the fruit. The same person's duty falls in such a priority category for which the person is not able to make a choice between right and wrong. Tries to prioritize its duty over karma.

Thought of ​​karma and duty

The idea of ​​karma and duty generates such an identity. In which, while performing actions in front of a person, it takes complete understanding to identify the right and the wrong and the good and the bad. Whereas in duty, a person does not even understand the meaning of identifying neither right nor wrong, neither good nor bad. Duty can only be done according to a time limit, while there is no time limit for doing karma. Human beings give more importance to karma in their duties. So the question of right and wrong arises on his duty. A person cannot even do his duty by his actions. Neither can he weigh his deeds by his duty. The subject and role of the two words, different languages, choose different changes.

Importance of Karma and Duty

Karma is a task in which a person becomes entitled to his fruits. To understand karma, a person can learn from those humans. Those who get to enjoy the fruits of good and bad deeds done by them. Karma is like a shadow of a person who can stand in front of that person at any time. Man can never get rid of his deeds. Regardless of the deeds of the previous birth, they have to come in front of the person one day or the other. Whether karma has come for good or whether karma has come for bad.

 

Duty is a task that helps a person to generate his livelihood. Duties for a person may vary from family, society, and country. The choice of duty is in the hands of the person himself. The entire line of duty is created by the person himself. No matter how difficult the duty is, it has to be done. Even if a person is standing in front of death in duty, he does not back down from his duty. Duty reveals an identity in which the personality of a person is different and the behavior appears different.

 

The importance of the reality of karma and duty always rests on the life of a person. From the birth of a person to death, karma goes on simultaneously. Whereas the duties of the person's age go along with the time-limit. The fruits of actions can only be given by God. While the fruits of duty can be given only by humans. Many humans give priority to karma in their life, while many people give priority to duty in their life.

The conclusion

The different value of karma and duty should be such for a person, for which his life can never be questioned.



       

 

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