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Showing posts from June, 2021

Reality of Addressing and Sensation(संबोधन और संवेदना की वास्तविकता) By Neeraj Kumar

  संबोधन और संवेदना की वास्तविकता इन्सान संबोधन से संवेदना के कार्य को कर सकता है| संबोधन एक ऐसा कार्य होता है| जिसमे एक इन्सान कई दुसरे इंसानों को संबोधित करता है या कोई बात बताने की कोशिश करता है, जो कभी दुसरे इंसानों ने उसके बारे में सुना नहीं हो| संबोधन में कभी कभी इन्सान अपनी संवेदना भी व्यक्त कर देता है| संबोधन वैसे तो कई दुसरे कार्यो के लिए भी किया जाता है, जिसमे कोई इन्सान अपने या कई दुसरे इंसानों को कोई बात बताता है| संबोधन बहुत से कार्यो के लिए किया जाता है| समाज कल्याण के कार्यो के लिए एक ऐसे मंच का उपयोग किया गया हो या किया जाता है| जो किसी पद या प्रतिष्ठा से जुडा हो| लेकिन कभी-कभी संबोधन के लिए इन्सान को कई तरह के मंच पर उतरना पड़ता है| संबोधन भी कई तरह के विषय का होता है, जिसके लिए संबोधन जरुरी बन जाता है| संवेदना एक ऐसा कार्य होता है जिसमे कोई इन्सान किसी दुसरे इन्सान को अपनी भावना व्यक्त करता है| जिसमे अधिकतर इन्सान किसी दुसरे इन्सान के दुःख दर्द के लिए अपनी सहानुभूति संवेदना के जरिये व्यक्त करते है| संवेदना देना भी इन्सान के उस संस्कार को दर्शा देता है| जो उसने अप

Reality of nation and state(राष्ट्र और राज्य की वास्तविकता) By Neeraj kumar

  राष्ट्र और राज्य की वास्तविकता राष्ट्र ही राज्य से परिपूर्ण होते है | और राज्य भी राष्ट्र से पहचाने जाते है| राष्ट्र का महत्व इन्सान के लिए उतना ही होना चाहिए, जितना की उसका जीवन| जबकि राज्य ही राष्ट्र से बनते है| राज्य और राष्ट्र के महत्व को समझने के लिए इन्सान के लिए सबसे पहले उसके राष्ट्र का महत्व जानना जरुरी हो जाता है| राष्ट्र देश है और देश से बढ़कर कुछ नहीं| जहाँ राष्ट्र की बात आती है, वहां राज्य के बारे में नहीं देखा जाता क्योकि राष्ट्र सही होगा तो राज्य भी अपने आप गतिशील होगा| राष्ट्र से हर उस इन्सान को प्यार होना चाहिए जिस राष्ट्र में उस इन्सान का जन्म हुआ है| राष्ट्र के लिए कई ऐसे इन्सान है जो अपने जीवन से भी ज्यादा महत्व अपने राष्ट्र को देते है| उनका जीवन ही अपने राष्ट्र को सशक्त शक्तिशाली और समृध्द बनाने में ही बीत गया| और आज वर्तमान में भी ऐसे इन्सान है जो अपने राष्ट्र के लिए हमेशा तट पर खड़े रहते है|   राज्य राष्ट्र का एक हिस्सा होता है राज्य ही एक राष्ट्र को सशक्त, शक्तिशाली और समृध्द बनाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है| दुनिया में अलग अलग राष्ट्र है और अल

Reality of man and father(पुरुष और पिता की वास्तविकता )By Neeraj kumar

पुरुष और पिता की वास्तविकता  पुरुष एक पिता है पुरुष वो इन्सान है जो दुनिया में सबसे ज्यादा संख्या में है पुरुष एक ऐसा इन्सान जिसके बिना दुनिया अधूरी समझी जाती है पुरुष समाज का वो चेहरा होता है जिसको सबसे ज्यादा अहमियत मिलती आई है इस सृष्टि की संरचना में दो ही प्राणियों की उत्पप्ति हुई एक स्त्री और एक पुरुष है पुरुष स्त्री से ज्यादा बलशाली होता है| जो अपने शारीरिक कद काठी और रंग रूप की तरह स्त्री से बिकुल अलग होता है पुरुष स्त्री से ज्यादा बलवान सिद्ध हुआ है| पुरुष ही समाज में एक पिता की भूमिका में अपने फर्ज को निभाता है| पिता घर परिवार का वो सदस्य होता है जिसपर अपने परिवार की जिम्मेदारी होती है जो अपने घर परिवार के लिए हमेशा से संधर्षपूर्ण रहता है पिता की भूमिका में एक पुरुष हर युग में अपनी भूमिका अच्छी तरह निभाता आया है पिता अपने उन रिश्तो को हमेशा से अहमियत देता आया है जो उसको एक पिता की संज्ञा से परिपूर्ण करते है| जैसे एक बेटा या बेटी | पुरुष और पिता का विचार  पुरुष ही एक ऐसा प्राणी है जिसके पास स्त्री के मुकाबले ज्यादा बल देखने को मिलता है| संसार में ना जाने कितने पुरुषो ने जन्

The Reality of ideal and teacher(आदर्श और अध्यापक की वास्तविकता) By Neeraj Kumar

  आदर्श और अध्यापक की वास्तविकता इन्सान अधिकतर अपने अध्यापक को ही अपना आदर्श बना लेता है| आदर्श होना इन्सान के जीवन के लिए उस सीडी का काम करता है जो इन्सान अपने जीवन में बनने का सपना देखता है| वैसे तो अध्यापक शब्द हमें विधालयो से मिलने वाले ज्ञान को देने वाले इंसानों को अध्यापक कहते है| और सही मायनो में अध्यापक उस इन्सान को भी कह सकते है जो अपने शिष्य को सही रास्तो का ज्ञान देता हो| और वो ज्ञान उस इन्सान को कही भी प्राप्त हो सकता है| आदर्श बनना और आदर्श बनाना, दोनों तरीको से आदर्श शब्द की वास्तविकता को पेश करना होता है| आदर्श इन्सान तभी बनाता है जब किसी इन्सान का प्रभाव उस इन्सान पर पूरी तरह से हो और वो अपने जीवन में उसके जीवन से प्रेरणा लेता हो| तब कोई इन्सान किसी दुसरे इन्सान को अपना आदर्श मान लेता है|   आदर्श और अध्यापक की विचार बहुत से इंसानों ने अपने जीवन में एक ऐसे आदर्श को चुना होगा जो उनके जीवन को सही दिशा और सही दशा करने का काम करता होगा| ज्यादातर इन्सान अपनी उपलब्धियों में उस इन्सान को अपना आदर्श समझ लेते ह

The Reality of Hindu and Hindustan(हिन्दू और हिंदुस्तान की वास्तविकता) By Neeraj kumar

  हिन्दू और हिंदुस्तान की वास्तविकता हिन्दू  धर्म एक ऐसा धर्म जो दुनिया में सबसे पहले हुआ | जिसका इतिहास करीब 10 हजार साल से भी पुराना मिलता है| जिसके प्रमाण अभी भी कही ना कही मिल जाते है| जो सत युग से त्रेता युग से द्वापर युग से कलयुग तक पहुच सका है| हर युग में हिन्दू धर्म के महत्व को समझाया गया है| हिंदुस्तान एक ऐसा देश है जो दुनिया का सातवाँ सबसे बड़ा देश माना जाता है| जिसको समुन्द्र ने तीनो और से घेर रखा है| हिंदुस्तान वो देश है| जहाँ स्वयं देवी देवताओ का वास है| जो स्वयं हिन्दू धर्म के लिए सही साबित होते है| हिमालय से कन्याकुमारी तक ना जाने कितने तीर्थ स्थल है| जो हिन्दुओ की आस्था के प्रतीक माने जाते है हिन्दू और हिंदुस्तान दोनों की वास्तविकता एक दुसरे से पूरी तरह जुडी हुई है| हिंदुस्तान एक ऐसा देश है जिसमे हर राज्य की अपनी एक भाषा होते हुए भी अपने आप में एकता का प्रतीक है| हिंदुस्तान की कोई मात्र भाषा नहीं है| सिर्फ हिंदुस्तान की राज भाषा है |  हिंदी जो सविधान लागू होने के बाद से मानी जाती है| हिंदुस्तान पर प्रचीन काल से ही दुसरे देशो की नजर बनी रही और आज भी पडोसी देशो की न

The Reality of Game and player(खेल और खिलाडी की वास्तविकता) By Neeraj Kumar

खेल और खिलाडी की वास्तविकता खेल वो है जिसको खिलाडी अपने मनोरंजन के लिए खेलता है| खेल को एक ऐसा मनोरंजन कह सकते है जिसमे खिलाडी की उपयोगिता बहुत महत्व रखती है| दुनिया में बहुत सारे खेल है और उन खेलो को खेलने के लिए खिलाडियों की जरुरत होती है किसी भी खेल को बिना खिलाडी के नहीं खेला जाता| सभी खेलो को खेलने के लिए खिलाडी की जरूरत होती है खेल का महत्व जीवन के बचपन से ही इन्सान महसूस करने लगता है| इन्सान अपने जीवन में कई खेल खेलता है लेकिन जब वो किसी खेल का खिलाडी बनने के बारे में सोचता है तो उस इन्सान के प्रति उस खेल को महत्व दिया जाता है| जिसका खिलाडी बनने के बारे में सोचा था| अलग अलग खेल को अलग अलग तरह से ही खेला जाता है| कुछ खेलो को खेलने के लिए कुछ विशेष वस्तुओ की जरुरत पड़ती है| उनके बिना कोई भी खिलाडी उस खेल को नहीं खेल सकता है और कुछ खेल ऐसे भी है जिनको खेलने के लिए कोई वस्तु की जरुरत नहीं पड़ती, वो सिर्फ खिलाडी आपस में ही खेल सकते है| खेल किसी भी उम्र में खेला जाये वो अपने मनोरंजन का पूरा उत्साह खिलाडियों में जगाये रखता है| खेल और खिलाडी का विचार खेल और खिलाडी दोनों का महत्व ए